सत्ता का संघर्ष.....2

अब जनता सोच रही हैं काश! हमारे पास मौका होता कि हम भी अपना वोट बदल पाते......।।।
अब सोचे भी क्यों ना रातों रात सरकार, 
जिसके मुँँह न देखने कसमें खाया करतें थे, 
जो फूटी आँख न सूआती थी, 
आज उस बिन सूरज ना उगे। (बेमेल का मेल / महाविकास अघाड़ी)

अब चाचाजी पर बात आ पड़ी। अरे! रात को कसमें खा रहे साथ ना छोड़ने की और पहर बाद धोखा दे गयें। चाचा न जाने कब से भरे पड़े हो बोल दिया इसमें हमारा हाथ नहीं हैं न जाने इस चेले को क्या सूझी हैं सब इसका ही करा धरा हैं। (पर मेरा मन यह मानने को तैयार नहीं)।
अब लोकतंत्र के चोथै स्तम्भ को एनालिसिस करने का मौका मिल गया। चाचा भतीजे के रिश्ते की कड़वाहट व मिठास का अपने मतलब परोसेंने लगे।
अब भी कहानीं का क्लाइमेक्स बाकी था...... सीधा सीधा बोले तो एक और  U टर्न......
अब चाचा जो ठहरे पुराने खिलाड़ी रातों रात लगा के तिकड़म करवा डाली एम एलों की परेड.....  (क्रमशःः2)

 ✍️शैतान सिंह बिश्नोई (Ssingh25)


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