Posts

कुर्सी का युद्ध-1 (चुनाव विशेष)

 काफी लम्बे समय बाद आपके सामने उपस्थित हुआ हूँ, इसके लिए माफ करना पर समय नहीं मिल रहा था, पर अब फिर लौट आए हैं, एक बार... विधानसभा चुनाव के रण की रणभेरीयां चहुँ दिशाओं में बज रही हैं। 5 राज्यों में होने वाले इन दिग्गजों के चुनावी रणों में जहाँ क्षेत्रीय पार्टिया सत्ता में है(पुदुच्चेरी को छोड़कर)   राष्ट्रीय पार्टियां गठबंधन में हैं।  पर इनके सब के बीच बंगाल कुछ नए ही अदांज में हैं। होड़ मची हैं इस गढ़ को फतेह करनी की। वो कहते हैं ना साम, दाम, दण्ड भेद सब पैंतरा चला रहा हैं। वैसे ये बातें तो होती रहेगी और हो रही हैं। आप सोच रहे होगें यह क्यों शुरू हो गया हैं.... सोचो यार आपका मन हैं। वैसे यार कल कुछ हो गया था वो सोचा बता दूँ...😊 कल शाम को लाइब्रेरी से निकलकर सोचा टहल लेते हैं। यह सोचकर परम सम्मानित राजनैतिक शास्त्र के पेजों में पेन डालकर नीचे आ गया।  फिर इधर-उधर टहलने लगा तो देखा एक महिला जो गेट से निकल रही और सीढियों से गिर गई, शायद पैर फिसला होगा। भाई हम दूर थे,.... हमनें बस देखा था वो भी बड़े दूर से....  तो उसके साथ चल रहे लोगों ने संभाल तब तक वो सीढियां से...

सत्ता का संघर्ष.....2

अब जनता सोच रही हैं काश! हमारे पास मौका होता कि हम भी अपना वोट बदल पाते......।।। अब सोचे भी क्यों ना रातों रात सरकार,  जिसके मुँँह न देखने कसमें खाया करतें थे,  जो फूटी आँख न सूआती थी,  आज उस बिन सूरज ना उगे। (बेमेल का मेल / महाविकास अघाड़ी) अब चाचाजी पर बात आ पड़ी। अरे! रात को कसमें खा रहे साथ ना छोड़ने की और पहर बाद धोखा दे गयें। चाचा न जाने कब से भरे पड़े हो बोल दिया इसमें हमारा हाथ नहीं हैं न जाने इस चेले को क्या सूझी हैं सब इसका ही करा धरा हैं। (पर मेरा मन यह मानने को तैयार नहीं)। अब लोकतंत्र के चोथै स्तम्भ को एनालिसिस करने का मौका मिल गया। चाचा भतीजे के रिश्ते की कड़वाहट व मिठास का अपने मतलब परोसेंने लगे। अब भी कहानीं का क्लाइमेक्स बाकी था...... सीधा सीधा बोले तो एक और  U टर्न...... अब चाचा जो ठहरे पुराने खिलाड़ी रातों रात लगा के तिकड़म करवा डाली एम एलों की परेड.....  (क्रमशःः2)  ✍️शैतान सिंह बिश्नोई (Ssingh25)

बिछड़न का दर्द*

अब कुछ ठीक-सा महसूस हुआ न जाने सुबह से कुछ  अजीब से लग रहा था। जब तक ज़िन्दगी के इस सफर में मेरे साथ नहीं था तब तक सब सही चल रहा था, इसके होने से न होने से मुझे कोई फ़र्क़ भी नहीं पड़ता था।अब पड़ता हैं;हाँ, पड़ता हैं, जब  हमारे बीच दूरियाँ बढ़ जाती हैं चाहे इसका हेतु कोई आपसी हो बाहरी। चलो, आपसी हो, तो इसे समझा-बुझाकर मना भी लें परन्तु जब कोई दूसरे के कारण रुठना होता हैं तो इसे समझाना बहुत टेठा हैं। जब-जब इसने साथ छोड़ा हैं तब ऐसे लगता हैं जैसे  मेरे दिल ने धड़कना बंद कर दिया हो, हवा रूठ गयी हो और सुनसान सा हो जाता हैं सब। न जाने कब उसनेंं दिलोदिमाग में जगह बना डाली कुछ समझ पाता उससे पहले सब कुछ हो गया। सोचा था हाय-हैलो तक ही रखेंगे पर फिर सोचा बस दोस्ती तक लेकिन जाने कब अपना हो गया। अब तो सोने से पहले और उठते ही पहली मुलाकात इनसे ही होती हैं। कभी कभी सोचता हूँ की इतना कोई कैसे अपना हो सकता हैं। इसके आने से कुछ आदतें बदली भी हैं, कुछ नई भी जोड़ी हैं। कुछ दूरियाँ कम हुई हैं और कुछ नजदीक होते हुए भी दूर। जब मेरे पास यह होता हैं,तो ऐसा लगता हैं कि दुनिया मेरी मुट्ठी में हैं। जिसने इ...

सत्ता संघर्ष...1

महाराष्ट्र बड़ा चर्चा में हैं इन दिनों में.... वैसे इस वेब सीरीज नहीं यार पूरी धारावाहिक ही बन गयीं हैं इस बार तो ... हर दिन का सफर एक सस्पेंस के साथ एक परिणाम की ओर फिर न जाने कहाँ से आता हैं एक हवा का झोंका सब कुछ उडा जाता हैं अपने साथ। न जाने क्या-क्या एक राजकुमार की ताजपोशी, एक पार्टी के बहुत जतनों के बाद शासक वर्ग में शामिल होने की मृग-तृष्णा और क्या-क्या नहीं देखने को मिला। फिर भी एक खेमे की शांति सता रही थीं। सताती क्यों न गोवा, कर्नाटक.........  ये याद ही होगें ना क्या किया था....।। पर क्या करें कोई अपना धोखा दे गया.... पर साथ साथ में धीरे धीरे कानाफूसी हो रहींं थी की सरकार तो हम ही बनायेंगे और हुआ भी यह ही चल इधर से नहीं तो  उधर से सहीं अपने गुरू/चाचा से नाराज चेले/भतीजे को कर लिया अपने पक्ष में और रातों रात करली दोनों के ताजपोशी की तैयारी (भूतपूर्व शासक व चेले)।   सुबह-सुबह अपने पुराने साथी के दृश्न किए तो वो बता रहा था अब तो किंगमेकर ही किंग बनेंगे।(अखबार)  फिर नये वाले (टीवी) से मिले तो वो कुछ ओर बता रहा था हम चक्करा से गये भाई क्या ...

नेता जी का विकास....

आज तो सुबह न जाने क्यों जल्दी उठ निकल पड़े सैर पर, ना भाई वो मार्निंग वाक पर। वैसे बिस्तर और हमारा साथ सुबह 10:00 तक तो रहता ही हैं। छोडो खेर इन बातों को आज सुबह घूमने का लुत्फ उठा रहे हैं हम तो ओर मिल गये हमारे दो अजीज मित्र और उनके कुछ लोग जो चर्चा में लीन थे। हम भी जहाँ धमके वहाँ और सुनने लगे उनकी बहस को हम भी पेड़ को सहारा बनाकर खड़े हो गये।सुनने लगे उनको............................ बात शुरू हुई देश के "विकास" के नाम पर।अब थोड़ा सा समय विकास को टटोला- मटोला,दोनों ने बताया हमनें फलां-फंला किया ;दूसरा बोला शुरू तो भाई हमनें किया था तुमनें बस नाम बदला हैं, पहला बोला बदलना भी बहुत बड़ी बात हैं! तुम्हें तो नाम भी नहीं मिल रहे थे वो ही 3-4नामों को बार- बार आगे बढ़ा रहें हो।ये हुई विकास की बात तब लगा यार आज कल एक नामी कोमेडी-शो"----------" बंद हो गया है तो बेचारी जनता का क्या हाल हो गया होगा।(चलो देर सबेरे याद तो किया...) ओर हो गया शंखनाद अपने छुपे हुए कलाकार का...... पप्पू से नामदार तक,सेवक से चौकीदार तक... चौकीदार से चोर, चोर से तानाशाह तक...... ओर कभी बंजरग बलि ...