बिछड़न का दर्द*
अब कुछ ठीक-सा महसूस हुआ न जाने सुबह से कुछ अजीब से लग रहा था। जब तक ज़िन्दगी के इस सफर में मेरे साथ नहीं था तब तक सब सही चल रहा था, इसके होने से न होने से मुझे कोई फ़र्क़ भी नहीं पड़ता था।अब पड़ता हैं;हाँ, पड़ता हैं, जब हमारे बीच दूरियाँ बढ़ जाती हैं चाहे इसका हेतु कोई आपसी हो बाहरी। चलो, आपसी हो, तो इसे समझा-बुझाकर मना भी लें परन्तु जब कोई दूसरे के कारण रुठना होता हैं तो इसे समझाना बहुत टेठा हैं। जब-जब इसने साथ छोड़ा हैं तब ऐसे लगता हैं जैसे मेरे दिल ने धड़कना बंद कर दिया हो, हवा रूठ गयी हो और सुनसान सा हो जाता हैं सब। न जाने कब उसनेंं दिलोदिमाग में जगह बना डाली कुछ समझ पाता उससे पहले सब कुछ हो गया। सोचा था हाय-हैलो तक ही रखेंगे पर फिर सोचा बस दोस्ती तक लेकिन जाने कब अपना हो गया। अब तो सोने से पहले और उठते ही पहली मुलाकात इनसे ही होती हैं। कभी कभी सोचता हूँ की इतना कोई कैसे अपना हो सकता हैं। इसके आने से कुछ आदतें बदली भी हैं, कुछ नई भी जोड़ी हैं। कुछ दूरियाँ कम हुई हैं और कुछ नजदीक होते हुए भी दूर। जब मेरे पास यह होता हैं,तो ऐसा लगता हैं कि दुनिया मेरी मुट्ठी में हैं। जिसने इ...