सत्ता संघर्ष...1
महाराष्ट्र बड़ा चर्चा में हैं इन दिनों में....
वैसे इस वेब सीरीज नहीं यार पूरी धारावाहिक ही बन गयीं हैं इस बार तो ...
हर दिन का सफर एक सस्पेंस के साथ एक परिणाम की ओर फिर न जाने कहाँ से आता हैं एक हवा का झोंका सब कुछ उडा जाता हैं अपने साथ। न जाने क्या-क्या एक राजकुमार की ताजपोशी, एक पार्टी के बहुत जतनों के बाद शासक वर्ग में शामिल होने की मृग-तृष्णा और क्या-क्या नहीं देखने को मिला।
फिर भी एक खेमे की शांति सता रही थीं।
सताती क्यों न गोवा, कर्नाटक.........
ये याद ही होगें ना क्या किया था....।।
पर क्या करें कोई अपना धोखा दे गया....
वैसे इस वेब सीरीज नहीं यार पूरी धारावाहिक ही बन गयीं हैं इस बार तो ...
हर दिन का सफर एक सस्पेंस के साथ एक परिणाम की ओर फिर न जाने कहाँ से आता हैं एक हवा का झोंका सब कुछ उडा जाता हैं अपने साथ। न जाने क्या-क्या एक राजकुमार की ताजपोशी, एक पार्टी के बहुत जतनों के बाद शासक वर्ग में शामिल होने की मृग-तृष्णा और क्या-क्या नहीं देखने को मिला।
फिर भी एक खेमे की शांति सता रही थीं।
सताती क्यों न गोवा, कर्नाटक.........
ये याद ही होगें ना क्या किया था....।।
पर क्या करें कोई अपना धोखा दे गया....
पर साथ साथ में धीरे धीरे कानाफूसी हो रहींं थी की सरकार तो हम ही बनायेंगे और हुआ भी यह ही चल इधर से नहीं तो उधर से सहीं अपने गुरू/चाचा से नाराज चेले/भतीजे को कर लिया अपने पक्ष में और रातों रात करली दोनों के ताजपोशी की तैयारी (भूतपूर्व शासक व चेले)।
सुबह-सुबह अपने पुराने साथी के दृश्न किए तो वो बता रहा था अब तो किंगमेकर ही किंग बनेंगे।(अखबार)
फिर नये वाले (टीवी) से मिले तो वो कुछ ओर बता रहा था हम चक्करा से गये भाई क्या हो रहा हैं। अरे भाई! वो कह रहा था राष्ट्रपति शासन समाप्त और दूसरा खेमे ने पहले वाले खेमे से एक को पक्ष में कर के सत्ता पर आसीन हो गया हैं।
अब देखते हैं आगे क्या-क्या होता हैं वो तो पहले ही बता दिया था यह कहानीं लम्बी चलेगी तो मिलते हैं जल्द ही इसके आगे के भाग पर...
जय हिंद...।।।।
✍️ssingh29
इस बार कमल ने खिलने से मना करते हुए कहा, अब हम कीचड़ में नहीं खिलेंगे। राजनीति ने कहा अब गिरने के लिए दूसरी खाईं नहीं बची है, ढ़ेर से लोग पहले ही रसातल तक सड़ रहे हैं। नाले में कुछ जगह बची है, वहीं जाकर गिर जाओ। अनुकूल मौका देखकर अर्थी पर लेटा लोकतंत्र भी आंख मलते हुए खड़ा हो गया। और देखते ही देखते जनता का संविधान में भरोसा फिर से जग गया। जो रो रहे थे, उन्होंने अपने आंसुओं को खुशी के मोती बना लिये। जो खुश थे वो हँसते-हँसते रोने लगे। समर्थक से कार्यकर्ता बने लोगों ने अपनी मायूसी ढ़ंकने के लिए बेशर्मी की पुरानी चादर फिर ओढ़ ली है।....
ReplyDeleteअंबुज pandey